शिक्षक दिवस एक ऐसा दिन, जिस दिन हम समाज के ऐसे शिल्पकार को या निर्माता को समर्पित करते हैं जो बिना किसी मोह के इस समाज को तराशते हैं, निखारतॆ हैं और इस योग्य बनाते हैं, ताकि वह आने वाले समय में अपने आप को एक उचित स्थान दे सके और समय के साथ-साथ आने वाली परिस्थितियों का सामना कर सके जिससे समाज- देश- विश्व एक वसुधैव कुटुंबकम् की तरह निर्वाह कर सकें।

शिक्षक

भारतीय संस्कृति में एक सूत्र वाक्य प्रचलित है "तमसो मा ज्योतिर्गमय" इसका अर्थ है अंधेरे से उजाले की ओर जाना इस प्रक्रिया को वास्तविक अर्थों में पूरा करने के लिए शिक्षा एवं शिक्षक और समाज तीनों का बड़ा महत्व है।
भारतीय समाज में जहां शिक्षा को शरीर मन और आत्मा के विकास का साधन माना गया है वहीं शिक्षक को समाज के समग्र व्यक्तित्व के विकास का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। इतिहास बताता है कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति में शिक्षक का वैदिक काल से आज तक अलग-अलग समय में अलग-अलग माध्यमों से विशेष महत्व रहा है। इसलिए भारतीय संस्कृति में शिक्षक को भगवान तुल्य माना गया है तभी तो भारतीय ग्रंथों में गुरु को इस प्रकार महिमामंडित किया गया है।

"गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः , गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरुवे नमः"
अर्थात, गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।

गुरु यानी शिक्षक की महिमा अपार है। उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, कवि, सन्त, मुनि आदि सब गुरु की अपार महिमा का बखान करते हैं। शास्त्रों में ‘गु’ का अर्थ ‘अंधकार या मूल अज्ञान’ और ‘रू’ का अर्थ ‘उसका निरोधक’ बताया गया है, जिसका अर्थ ‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला’ अर्थात अज्ञान को मिटाकर ज्ञान का मार्ग दिखाने वाला ‘गुरु’ होता है। गुरु को भगवान से भी बढ़कर दर्जा दिया गया है। सन्त कबीर कहते हैं:-

गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय।।

अर्थात, गुरु और गोविन्द (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए, गुरु को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरु के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है, जिनकी कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस संबंध में महर्षि अरविंद ने एक बार शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा था कि 'शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।' महर्षि अरविंद का मानना था कि 'किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं।' इस प्रकार एक विकसित, समृद्ध एवम् हर्षित राष्ट्र व विश्व के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन

सन् 1962 में जब भारत के महान शिक्षाविद् डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति के रूप में पदासीन हुए तो उनके चाहने वालों ने उनके जन्मदिन को “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाने की अपनी इच्छा उनके समक्ष प्रकट की। इस पर उन्होंने स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हुए अपनी अनुमति प्रदान की और तब से लेकर आज तक प्रत्येक 5 सितम्बर को “शिक्षक दिवस” के रूप में उनका जन्मदिन मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा को एक मिशन के रुप में देखा और उनके अनुसार शिक्षक होने का अधिकारी वही व्यक्ति है, जो अन्य जनों से अधिक बुद्धिमान व विनम्र हो। उनका कहना था कि उत्तम अध्यापन के साथ-साथ शिक्षक का अपने विद्यार्थियों के प्रति व्यवहार व स्नेह उसे एक सुयोग्य शिक्षक बनाता है। मात्र शिक्षक होने से कोई योग्य नहीं हो जाता बल्कि यह गुण उसे अर्जित करना होता है। शिक्षा मात्र ज्ञान को सूचित कर देना नहीं होती वरन् इसका उद्देश्य एक उत्तरदायी नागरिक का निर्माण करना है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले विद्यालय निश्चित ही ज्ञान के शोध केंद्र, संस्कृति के तीर्थ एवं स्वतंत्रता के संवाहक होते हैं।

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

जीवन परिचय
जन्म 5 सितंबर 1888 को
जन्म स्थान तिरु मनी गांव मद्रास
माता - सीताम्मा,पिता- सर्वपल्ली विराज स्वामी ,1904 में विवाह, विवाह के समय उनकी उम्र मात्र 16 वर्ष और उनकी पत्नी की उम्र मात्र 10 वर्ष थी. वर्ष 1908 में इन्होने एक पुत्री को जन्म दिया. राधाकृष्णन जी की पत्नी की मौत 1956 में हो गई थी.

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन बचपन से मेधावी छात्र थे. इनकी प्रारंभिक शिक्षा क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में हुई. इसके बाद वे आगे की पढाई के लिए वर्ष 1900 ने वेल्लूर चले गए. जहाँ उन्होंने वर्ष 1904 तक शिक्षा ग्रहण की. वर्ष 1902 में इन्होने मैट्रिक स्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की जिसके लिए इन्हें छात्रवृति भी प्रदान की गयी थी. इसके बाद 1904 में इन्होने कला संकाय परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. इस दौरान इन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता प्राप्त हुई थे. इसके बाद इन्होने दर्शनशास्त्र में अपना स्नाकोत्तर पूरा किया.
वर्ष 1909 में अपनी स्नाकोत्तर की पढाई पूरी करने के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक के रूप में कार्य किया. जिसके बाद वर्ष 1916 से 1918 तक मद्रास रजिडेसी कालेज में भी दर्शन शास्त्र के सहायक प्राध्यापक के तौर में भी काम किया. वर्ष 1918 मैसूर यूनिवर्सिटी के द्वारा उन्हें दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में चयनित हुए। फिर इंग्लैंड के oxford university में भारतीय दर्शन शास्त्र के शिक्षक बन गए।

शिक्षा सम्बन्धी उपलब्धियां

उपलब्धियों के दायरे में निम्नवत संस्थानिक सेवा कार्यों को देखा जाता है-
* सन् 1931 से 36 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे।
* ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे।
* कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया।
* सन् 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
* 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे।
* 1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई

* डॉ सर्वपली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद उन्हें सविधान निर्माता सभा का सदस्य चुना गया।
* वे 1947 से 1950 तक इसके सदस्य रहे। उसके बाद उन्हें सोवियत संघ का राज दूत के लिए भी
चयन किया गया 1952 में उनके संघ में आने के बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित किया गया और 1962 में उन्हें भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित किया गया था।
* 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा सर की उपाधि प्रदान की गई लेकिन स्वतन्त्रता के बाद उसका औचित्य समाप्त हो गया तो डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के द्वारा उन्हें 1954 भारत रत्न प्रदान किया गया।
* 1962 में राधा कृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्म दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी।
* 1962 में उन्हें 'ब्रिटिश एकेडमी' का सदस्य बनाया गया।
* पोप जॉन ने उन्हें " गोल्डन स्पर" भेट किया।
* 1967 को उन्होंने गणतंत्र दिवस पर अंतिम भाषण दिया था।
* 17 अप्रैल 1975 को उनकी मृत्यु हो गयी।

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4 Comments

  1. Nice,
    Happy Teacher’s Day to you also in advance,
    because you are also in the way.

  2. गिजुभाई बधेका
    सावित्रीबाई फुले
    एकलव्य फाउंडेशन, भोपाल
    होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम
    अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन

    के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिएगा।

    हार्दिक शुभकामनाएं।

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