मंदिर की स्थिति

रूद्रनाथ मन्दिर भारत जे उत्तराखंड राज्य मैं स्थित है। यह समुद्रतल से 2290 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर भव्य प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण है। रुद्रनाथ मंदिर में भगवान शंकर के मुख की पूजा की जाती है, जबकि संपूर्ण शरीर की पूजा नेपाल की राजधानी काठमांडू के पशुपतिनाथ में की जाती है।

यात्रा का मार्ग

इस स्थान की यात्रा के लिए सबसे पहले आपको उत्तराखंड पहुंचना होता है। उसके बाद चमोली जिले का मुख्यालय गोपेश्वर में जो एक आकर्षक हिल स्टेशन है जहां पर ऐतिहासिक गोपीनाथ मंदिर है। इस मंदिर का ऐतिहासिक लौह त्रिशूल भी आकर्षण का केंद्र है। गोपेश्वर से करीब पांच किलोमीटर दूर है सगर गांव है।

09-08-2020 का दिन (मार्ग की जानकारी)

हर साल की तरह इस साल भी दो तीन महीनों की तैयारी के बाद आखिरकार 9.8.2020 को 11 लोगो का दल रुद्रनाथ की यात्रा के लिए रवाना हुआ सुबह 7.15 बजे हम गाड़ी से सगर गाँव तक गए 8.45 से हमने पैदल यात्रा शुरू की। सगर गावँ से रुद्रनाथ की दूरी लगभग 19 km है। सगर गावँ से ही चढाई शुरू हो जाती है हमारे सभी दोस्त काफी तेजी से चल रहे थे तो हम 1 घण्टे में ही पुंग बुग्याल पहुच गए।

(पुंग बुग्याल यह लंबा चौडा घास का मैदान है जिसके ठीक सामने पहाडों की ऊंची चोटियों को देखने पर सर पर रखी टोपी गिर जाती है। गर्मियों में अपने पशुओं के साथ आस-पास के गांव के लोग यहां डेरा डालते हैं, जिन्हें पालसी कहा जाता है।
पुंग बुग्याल के बाद कलचात बुग्याल और फिर चक्रघनी की आठ किलोमीटर की खडी चढाई ही असली परीक्षा होती है। चक्रघनी जैसे कि नाम से प्रतीत होता है कि चक्र के सामान गोल। इस दुरूह चढाई को चढते-चढते यात्रियों का दम निकलने लगता है। चढते हुए मार्ग पर बांज, बुरांश, खर्सू, मोरु, फायनिट और थुनार के दुर्लभ वृक्षों की घनी छाया यात्रियों को राहत देती रहती है। रास्ते में कहीं कहीं पर मिलने वाले मीठे पानी की जलधाराएं यात्रियों के गले को तर करती हैं। इस घुमावदार चढाई के बाद थका-हारा यात्री ल्वीटी बुग्याल आता है।)
पुंग बुग्याल- वहाँ से खड़ी चढ़ाई शुरू होती है मेरे साथी तो बहुत तेज चल रहे थे और मेरी हालत बहुत खराब हो रही थी तो में पीछे पीछे अकेले ही यात्रा का आनंद ले रही थी। 11 बजे हम लोग ल्योटी बुग्याल पहुँचे वहाँ हमने नास्ता किया। थोड़ा विश्राम करने के बाद अपनी यात्रा शुरू की । ल्योटी से लगभग 4 km की दूरी पर पनार बुग्याल स्थित है वहा पर 1 होटल है जिसमें नास्ता खाना और रात को रुकने की व्यवस्था है। कई यात्री रात्री बिश्राम यही करते है।चलते चलते अब हम पनार पहुंच गए है।

(यह वह स्थान हैं जहां से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का जो विस्मयकारी दृश्य दिखाई देता है वो दूसरी जगह से शायद ही दिखाई दे। नंदादेवी, कामेट, त्रिशूली, नंदाघुंटी आदि शिखरों का यहां बडा नजदीकी नजारा होता है। पनार के आगे पित्रधार नामक स्थान है पित्रधार में शिव, पार्वती और नारायण मंदिर हैं। यहां पर यात्री अपने पितरों के नाम के पत्थर रखते हैं। यहां पर वन देवी के मंदिर भी हैं जहां पर यात्री श्रृंगार सामग्री के रूप में चूडी, बिंदी और चुनरी चढाते हैं। रुद्रनाथ की चढाई पित्रधार में खत्म हो जाती है।)
पनार में पहुँचते ही बारिश शुरू हो गयी।
नीचे आते हुए यात्रियों को देख कर ऐसा लग रहा था कि हम कब पहुँच पायेंगे ।फिर पूरे जोश के साथ यात्रा की अब हमें रंग बिरंगे फूल दिखने लगे और उनकी खुशबू हमे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी पर इस साल और सालो की भांति कम ही फूल थे। पनार की चढ़ाई पूरी करने के बाद हम पित्र धार पहुँचे जहाँ से रुद्र नाथ की दूरी मात्र 7 km रह जाती है और चढाई भी खत्म हो जाती है। 3 बजे हम पंच गंगा पहुँचे जहाँ हम लोगो ने चाय पी मानो पहाडों मैं चाय की यही चुस्की अमृत का काम करती हो फिर
थोड़ा आराम किया यहाँ भी रात्रि बिश्राम की व्यवस्था है पंच गंगा से बड़ा ही मनमोहक दृश्य दिखाई देते है ऐसा लगता है मानो स्वर्ग धरती पे आ गया हो। 3 बजे के बाद मौसम पूरी तरह खुल गया था तो हमने बहुत सारी फ़ोटो भी खिंचाई ओर 4.30 पर हम मंदिर में पहुँच गए ।

मंदिर पहुँचने के बाद सब लोग थकान से चूर हो चुके थे। हमने अपने पीठ पर लदे बैग जो कि 19 km से हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे थे उनको उतारकर एक साइड में रख दिया और पैर पसार कर बैठ गए। 10 मिनट बाद हमारे ग्रुप के एक लड़के ने बगल वाले कमरे में चाय बनायी जहाँ पहले से ही कुछ लोगो ने आग जलाई थी चाय पीने और बिस्कुट खाने के बाद जान में जान आयी पर अभी भी हमारे तीन साथी पीछे ही थे और हमे धर्म शाला में कमरे की व्यवस्था भी करनी थी उस दिन भीड़ बहुत होने से हमे बहुत दिक्कतें आयी मैं तो बहुत थक गई थी आगे मेरे बस का कुछ नही था तो मेरे साथ के दोस्तो ने कमरा देखना शुरू किया पर सारे ही कमरे भरे हुए थे वहां पर लोगो ने पहले ही कमरो पर कब्जा कर लिया था 2 कमरे खाली थे जिसमें से 1 में जो कि ठीक था पन्द्रह बीस लोगो ने बात की थी मंदिर के प्रबंधक ने हमे इसी रूम को दिलाने की दिलासा में 3.30 घण्टे का इंतजार कराया और लास्ट टाइम में कहा कि वहाँ तुम्हारी व्यवस्था नही हो सकती और 1 दूसरा रूम दिखाया जो बहुत गीला हुआ था पर हम लोगो की मजबूरी थी इसके बाद कोई भी कमरा खाली नही था तो हम सब ने अपने बैग उस कमरे में रख दिये तब तक हमारे तीन साथी भी आ चुके थे।
अब हमें कमरा भी मिल चुका था हमारे तीन साथी लकडी लेने चले गए और कुछ जमीन में बिछाने के लिए घास लेने गए करीब आधे घण्टे बाद सारी व्यवस्था हो चुकी थी और मंदिर में पूजा का समय भी हो गया था । हम सब लोग आरती में शामिल होने चले गए और भगवान रुद्रेश को नमन किया 7.15 बजे हम कमरे में आये और आग जलानी शुरू की पर उस कमरे में आग जलाना बड़ा ही मुश्किल काम था, पर हमने भी हार नही मानी 3 4 लोगो ने बारी बारी से प्रयास किया और आखिरकार आग जल ही गयी। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी और लोग अभी भी आ ही रहे थे जिस कमरे में हम रुके थे उस कमरे में कुल 30 लोग थे ।
8 बजे हमने खाना खाया फिर सोने की तैयारी करने लगे सब लोगो ने एक एक कम्बल अपने साथ ले जा रखी थी औऱ कुछ कम्बल हमे वहां से भी मिली जो कि काफी थी । और लोगो के पास तो ओढ़ने तक लिए कुछ नही था उस हिसाब से हमारे पास भरपूर था।

पर शायद उस दिन रुद्रेश काफी क्रोध में थे ठीक 10 बजे बाद बारिश शुरू हो गयी और कमरे में छत टपकने लगी जिससे बिस्तर भीगने लगा और हमारे कुछ साथी उठ गए अचानक से कमरे की नाली भी फूट गयी और सारे कमरे पे पानी भर गया और सारी कम्बले पानी मे तैरने लगी फिर क्या था हो गयी तपस्या शुरू 12 बजे कमरे से बाहर आ गए और कुछ साथी मंदिर समिति वालों के पास मदद के लिये गए पर उन्होंने उनको डरा धमकाकर भगा दिया। अब उस कड़ाके की ठंड में रात बिताना मुश्किल हो गया पर भगवान कभी अपने भक्तों के साथ बुरा नही होने देते और हमे एक टिन शेड मिला जहाँ पर भोले बाबा के लिए भंडारा बनता है वही पर हमने सारी रात गुजारी और उस रात का एक एक मिनट एक घंटे के बराबर लग रहा था। पर कहते है अँधेरे के बाद उजाला भी होता है औऱ जैसे ही पांच बजे तो रुद्रनाथ की सुंदरता ने मानो हमे अपनी ओर आकर्षित कर दिया और जो भी घटना हमारे साथ रात में घटी हम भूल गए और प्रकृति का आनदं लेने लगे। 5.30 बजे स्नान करने के बाद हम वहाँ की प्रातः काल की सुंदरता को कैमरे में कैद करने लगे । 6 बजे हमने पूजा की और 100 मीटर की दूरी पर स्थित सरस्वती कुंड देखने गए पर आजकल के टाइम में हम लोग प्रकृति की सुंदरता को कैमरे में कैद करने में बिजी रहते है। जिससे वहा की सुंदरता को अपने मन मे नही उतार पाते हमने भी वही किया करीब 1 घण्टे तक फ़ोटो शूट करने के बाद हम मंदिर में वापस मंदिर में आ गए। अब तक समय 7 बज चुका था और सब दोस्तो ने यह निर्णय लिया कि अब घर चला जाये और भगवान रुद्रेश को नमन करके हम अब रास्ता लग गए। करीब 9 बजे हम पंच गंगा पहुचे और वहाँ पर नास्ता करने बैठे तो हमारी रात की बची रोटी और मैग्गी खाने का निर्णय लिया दुकानदार से हमने 9 मैगी और 9 चाय का आर्डर देकर आराम करने लगे 10 मिनट बाद मैगी आयी और रोटी का बैग देखा तो उसमें रोटियां ही नही थी क्योंकि हमारे 2 साथी आगे चले गए थे औऱ रोटियां भी उन्ही के बैग में आ गयी थी जो चमक पहले सबके चेहरे पे नास्ता करने की थी वो अब मुरझा गए थे । अब हमने अपनी भूख को मैगी और चनों से शांत किया और होटल वाले का धन्यवाद अदा कर घर की तरफ चल दिए। अब बारिश शुरू हो चुकी थी सब साथी अपनी क्षमता के हिसाब से चल रहे थे रास्ते मे गप्पें लगाते फ़ोटो खीचते सफर कटता गया और 12 बजे हम पनार पहुच गए वहाँ हमने चाय पी और थोड़ा आराम भी किया। अब यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर ल्योट्टी बुग्याल में मेरे कुछ दोस्तों ने चाय पी और मैंने भात खाया पर वह खाना खाना मुझे पैसो की बर्बादी लगी क्योकि खाना कीमत के हिसाब से बिल्कुल भी सही नही था ना मिर्च ना नमक बस काले चने उबालकर लोगो को परोसा जा रहा था। मैंने भी 80 रुपये दान समझकर दे दिया। अब यहाँ से बहुत ढ़लान थी तो चलना मुश्किल हो रहा था मेरे साथी आगे निकल चुके थे मैं भी आराम आराम से लोगो को देखते हुए जा रही थी रास्ते मे अकेले जाने से 1 फायदा होता है हम खुद से बात कर सकते है मैंने भी वही किया और करीब 3 बजे पुंग बुग्याल पहुँच गए जहाँ मेरे साथी आराम कर रहे थे। वहां पर हमने फ़ोटो खिंचाई और यात्रा पर चर्चा करने लगे। 15 से 20 मिनट तक आराम करने के बाद आगे बढ़ गए करीब 4 बजे सगर गावँ पहुँच चुके थे थकान से चूर फिर भी हम लोगो ने गोपेश्वर तक पैदल ही जाने का निर्णय लिया औऱ हाथ मे कुरकुरे और पैप्सी का मजा लेते हुए आगे बढ़ते गए 5.30 बजे हम गोपेश्वर पहुँच गए ।

यात्रा का सही समय

यूं तो मई के महीने में जब रुद्रनाथ के कपाट खुलते हैं तभी से यहां से यात्रा शुरू हो जाती लेकिन अगस्त सितंबर के महीने में यहां खिले फूलों से लकदक घाटियां लोगों का मन मोह लेती हैं। ये महीने ट्रेकिंग के शौकीन के लिए सबसे उपयुक्त हैं। गोपेश्वर में आपको स्थानीय गाइड और पोर्टर आसानी से मिल जाते हैं। पोर्टर आप न भी लेना चाहें लेकिन यदि पहली बार जा रहे हैं तो गाइड जरूर साथ रखें क्योंकि यात्रा मार्ग पर यात्रियों के मार्गदर्शन के लिए कोई साइन बोर्ड या चिह्न नहीं हैं। पहाडी रास्तों में भटकने का डर रहता है। एक बार आप भटक जाएं तो सही रास्ते पर आना बिना मदद के मुश्किल हो जाता है।
हम कहीं भी यात्रा पर जाते है तो हमे कठिनाई का सामना करना पड़ता है और शायद यही हमारी असली यात्रा भी होती है। हमे बुरी यादो को भुलाकर जो भी अच्छा हुआ उसे अपनी यादे बना लेनी चाहिए।

धन्यवाद....

लेखक .- पूजा

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5 Comments

  1. बहुत मनमोहक यात्रा वृतांत
    और आपके द्वारा दी गई जानकारी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
    आपने जो भी बताया वह हमारी यात्रा में अवश्य काम आएगा

  2. It is a very beautiful place the beauty here fascinates the mind and the temples here are very good

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