"रूपकुंड",  "कंकालों की झील",  या "रहस्यमयी झील"  अथवा "हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात-यात्रा का अंतिम पड़ाव"।

जिस भी नाम से कहना चाहें परंतु इस झील का रहस्य समय के साथ-साथ अपने आप में एक नया चेहरा दिखाता रहता है इसी में आज हम बात करेंगे "रहस्यमयी झील रूपकुंड" की।

वैसे तो उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में अंतर्गत अनेक सुरम्य ऐतिहासिक स्थल हैं जिनकी जितनी खोज की जाए उतना ही रहस्य सामने आते रहते हैं ।
आकर्षक एवं मनमोहक स्थलों में से एक है रूपकुंड जिसे कंकालों की झील या रहस्य भरी झील भी कहा जाता है यह जलाशय (झील) चमोली जिले के "वेदनी बुग्याल" के निकट स्थित है। जो लगभग 5029 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ऐसा कहा जाता है कि इस कुंड के निर्मल जल में पार्वती अपना प्रतिबिंब देखकर मंत्रमुग्ध हो गई थीं। उसके बाद उन्होंने अपना आधा सौंदर्य इस ताल को ही समर्पित कर दिया था । परंतु सौंदर्य के साथ-साथ यह झील अपने आप में कई रहस्य को छुपाए बैठी है। इन्हीं रहस्यों को उजागर करने के लिए समय-समय पर यहां कई भूवैज्ञानिक,पत्रकार एवं समाजिक कार्यकर्ता आदि अनेकों व्यक्ति आये और सब ने इस झील के रहस्य को अपने अपने तरीके से उजागर किया है। इन्हीं रास्तों में एक है "रूपकुंड झील" का दूसरा नाम "कंकालों की झील" इन कंकालों के रहस्य को आज तक पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है।

"रूपकुंड झील का रहस्य"-

एक किविदंती बतलाती है कि सदियों पहले एक राजा और उसकी रानी ने बुग्याल में स्थित नंदा देवी मंदिर के दर्शन करने की अभिलाषा रखी । मंदिर के दर्शन के लिए राजा और रानी पहाड़ों की ओर चल पड़े परंतु वह साथ में अपनी सेना तथा भोग विलास की वस्तुएं भी ले आए मंदिर परिसर या रूपकुंड के आसपास आने के बाद उनके इस भोग विलास की वस्तुओं से देवी क्रोधित हो गई उनका क्रोध बिजली बन कर उन पर गिरा और वह वहीं मौत के मुंह में समा गए।

"एक अन्य कथा" के अनुसार कहते हैं कि यह किसी महामारी के शिकार लोगों के कंकाल हैं
परंतु कुछ लोग उन्हें आर्मी वाले लोग बताते हैं जो बर्फ के तूफान में फस गए "इंडिया टुडे" की रिपोर्ट के मुताबिक लोगों का मानना था कि यह अस्थियां कश्मीर के जनरल "जोरावर सिंह" और उसके सहयोगियों की हैं जो 1841 में तिब्बत के युद्ध से लौट रहे थे। 1942 में पहली बार एक ब्रिटिश फॉरेस्ट गार्ड को यह कंकाल दिखे उस समय से माना गया था कि यह जापानी सेना के कंकाल हैं, जो द्वितीय विश्वयुद्ध में यहां के रास्ते जा रहे थे। और वहीं पर मर कर रह गए।

2004 में एक बार इस घाटी के रहस्यों को उजागर करने के लिए कुछ लोगों ने इन कंकालों की जांच की और एक रहस्य सामने आया कि यह जो कंकाल हैं वह वर्तमान को छोड़कर करीब 1000 साल पुराने 8वीं से 9वीं ईस्वी के आसपास के लोगों के हैं और इन में कोई परिवारिक संबंध नहीं है कुछ लोग हैं जो एक दूसरे से संबंधित थे परंतु अधिकतर लोग एक दूसरे से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं रखते हैं कुछ लोगों को कहना था कि यहां किसी समय कुछ तीर्थयात्री आए होंगे उन्हें लेकर कुछ स्थानीय लोग इस जगह पर पहुंचे होंगे तो जो संबंध मिलते हैं कुछ लोग में या कंकालों में एक दूसरे से वह स्थानीय लोग हैं जो तीर्थ यात्राओं को लेकर आए थे वह उनके थे और जो तीर्थयात्री थे वह अलग-अलग परिवार संबंधों से थे उन सब की जांच करने के बाद पता चला कि उन सब की मृत्यु किसी बीमारी से नहीं हुई है उनके खोपड़ी में फैक्चर के साक्ष्य मिले हैं जिन्हें हैदराबाद पुणे और लंदन के वैज्ञानिकों ने यह निर्धारित किया है कि लोग को ओलावृष्टि या बर्फ में गिरने से उनकी मृत्यु हुई है।

कई कंकाल भली-भांति सुरक्षित थे परन्तु इस क्षेत्र में भूस्खलन के साथ कुछ कंकाल झील में चले गए। जो बात निर्धारित नहीं हो सकी है कि यह समूह कहाँ जा रहा था इस क्षेत्र में तिब्बत का व्यापार मार्ग होने का कोई ऐतिहासिक सबूत भी नहीं है। लेकिन रूपकुंड नंदा देवी की महत्वपूर्ण यात्रा के मार्ग पर स्थित है जहां "नंदा देवी राजजात उत्सव" लगभग "प्रति 12 वर्ष" में एक बार मनाया जाता है जिस कारण इनकी सम्भावना ज्यादा होती है कि ये तीर्थ यात्री रहे होंगे। परन्तु यह झील इन सब रहस्य को अपने अंदर समाए होने के बावजूद भी अपनी सुंदरता और प्रकृति का एक अद्भुत दृश्य को संजोए हुए है। जो किसी भी यात्री या पर्यटक के लिए मंत्रमुग्ध करने लायक है इसलिए आज भी यहां पर समय-समय पर यात्रीगण या पर्यटक अपनी आस्था और अपने रोमांच को लिए यहां जाते रहते हैं और प्रकृति, झील और हिमालय की इन वादियों का आनंद लेते रहते हैं इसके साथ ही हर 12 वर्ष में यहां नंदा देवी की यात्रा के लिए तीर्थयात्री लाखों की संख्या में आते हैं और इस झील में स्नान करके अपने आप को धन्य महसूस करते हैं। यहां जाने के लिए आपको मार्च के बाद और सितंबर-अक्टूबर से पहले का समय उचित रहता है क्योंकि उस समय यहां बर्फ पिघलनी शुरू होती है नीचे बेदनी बुग्याल है जहां हल्की घास और पहाड़ों पर ब्रह्मकमल दिखाई देने लगता है जो आपकी इस यात्रा को और भी आनंद मई बनाता है।

"कैसे जाएं रूपकुंड"-

रूपकुंड जाने के लिए आपको सबसे पहले उत्तराखंड के ऋषिकेश या हल्द्वानी पहुंचना होगा उसके बाद आपको बस या किसी छोटे वाहन में चमोली जिले के मुंदोली के समीप आखिरी गांव वाण तक पहुंचना होगा वहां से आपको अपनी पैदल यात्रा का शुभारंभ करना होगा। यहां जाने के लिए आपको एक गाइड की आवश्यकता पड़ती है जो आपको आसानी से आज के समय में स्थानीय लोग मिल जाते हैं और वह आपको इस जगह से भली-भांति रूबरू कराते हैं। जिससे कि आप अपनी यात्रा को इंजॉय कर सकें। ऋषिकेश से यहां की दूरी लगभग सड़क मार्ग है वह 300 से 350 किलोमीटर के आसपास है और सड़क से रूपकुंड के लिए लगभग 1 से 2 दिन का रास्ता है रास्ते में कई पड़ाव है उन पढ़ाओ पर वन विभाग या सरकार की तरफ से कुछ रहने की व्यवस्था की गई है परंतु आप जब भी आए अपने साथ कुछ सामान, रहने का या खाने-पीने का कुछ संसाधन अवश्य रख लें जिससे कि आपको रास्ते में समस्याओं का सामना ना करना पड़े।

धन्यवाद

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