हिमालय की गोद ,पर्वतीय अंचल में स्थित देवभूमि उत्तराखंड की धार्मिक मान्यताएं बाकी दुनिया से जरा अलग हैं। यहां पर उन्हें भी आदर सम्मान मिलता है जिन्हें स्वयं देवता भी ठुकरा देते हैं तभी तो यहां देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने जिस दानव की गर्दन सुदर्शन से काट दी थी उसका मंदिर बनाकर यहां उसे पूजा जाता है। जीवन में संतुलन होना जरूरी है जब भी संतुलन बिगड़ता है तो उसके घातक परिणाम देखने को मिलते हैं यह संतुलन ग्रह दशा में होना भी जरूरी है ऐसा ना होने पर विपत्ति आने लगती है परेशानियों का सामना करना पड़ता है। राहु दोष ऐसा ही एक दोष है जिसे शांत करने के लिए तमाम उपाय करते हैं। जहां राहु की दृष्टि पड़ने से भी लोग बचते हैं वहीं "पैठणी" (पौड़ी गढ़वाल) में इस राहु मंदिर में राहु की पूजा की जाती है वह भी भगवान शिव के साथ।

मंदिर की स्थिति

उत्तराखंड में पौड़ी जनपद के विकासखंड थलीसैंण में स्थित है। यह पौड़ी मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर "पैठणी" गांव में दो नदियों के (पश्चिमी नयार और स्यौंलीगाड़) संगम पर स्थित यह राहु मंदिर के नाम से विश्व विख्यात स्थल है। स्थानीय लोगों के लिए यह आस्था और श्रद्धा का एक अद्भुत प्रतीक है मंदिर की बनावट बहुत ही नक्काशी दार है मंदिर के आंगन में दो नंदी की शिला मूर्ति भी विराजमान हैं अंदर शिवलिंग स्थापित है मंदिर के दाएं और से स्यौंलीगाड़ और बाएं ओर से पश्चिमी नयार बहती है सामने इन दोनों नदियों का संगम होता है जो मंदिर की सुंदरता को और अधिक बढ़ाता है।

मंदिर का इतिहास

स्कंद पुराण में मिलता है वर्णन"- स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णन है कि राष्ट्रकूट पर्वत पर पश्चिमी नयार एवं स्यौलीगाड़ के संगम पर राहु ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी इसी कारण यहां राहु के मंदिर की स्थापना हुई और राष्ट्रकूट पर्वत के नाम पर ही यह "राठ" क्षेत्र कहलाया साथ ही राहु के गोत्र "पैठीनसि" के कारण इस गांव का नाम "पैठाणी" पड़ा यह भी मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान जब राहु ने छल से अमृत पान कर लिया तो श्री हरि ने सुदर्शन चक्र से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया ऐसी मान्यता है कि राहु का सिर इसी स्थान पर गिर गया था।

परंतु कुछ मान्यताओं के अनुसार इसी स्थान पर राहु ने शिव की आराधना की थी जिसके कारण इस "शिव मंदिर" को "राहु मंदिर" के नाम से जाना जाता है परंतु इस मंदिर में राहु से संबंधित शिलालेखों से मिली जानकारी के अनुसार यह मान्यता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था।

पर्यटन केंद्र के रूप में मंदिर

उत्तर भारत में एकमात्र दानव मंदिर (राहु मंदिर) के नाम से विद्यमान पौड़ी जनपद के पैठानी नामक गांव में स्थित यह मंदिर पर्यटन के क्षेत्र में आशातीत अभिवृद्धि कर सकता है क्योंकि इससे रास्ते दुधातोली नामक पर्वत पर जाया जा सकता है जोकि उत्तराखंड के पामीर के नाम से प्रसिद्ध है जहां से पांच नदियों की धार निकलती है जो पंचधारा के नाम से विख्यात है उन्हीं में से एक धारा पश्चिमी नयार के रूप में इस राहु मंदिर के समीप खंड-स्यौंली से आने वाली स्यौंलीगाड़ से संगम बनाती है।
जैसा कि ऊपर वर्णन किया जा चुका है कि यह उत्तर भारत का एकमात्र राहु मंदिर है अर्थात यहां समस्त उत्तर भारत समेत मध्य भारत, पूर्वी भारत, पश्चिमी भारत एवं दक्षिण भारत तक के लोगों की जिजीविषा है कि इस मंदिर के दर्शन अवश्य किए जाएं किंतु आवश्यकता है कि इस मंदिर को अधिक से अधिक उत्तराखंड के पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए और सरकार के द्वारा भी इसे एक पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए ताकि इस मंदिर की महिमा का वर्णन अधिक से अधिक देशवासियों तक पहुंच सके और इसमें आने वाले दशकों में पर्यटन के क्षेत्र में स्थानीय युवाओं के साथ-साथ राज्य को भी लाभ पहुंचे।

कैसे पहुंचे पैठानी (राहु मंदिर)

उत्तराखंड राज्य के अन्य किसी भी जिले के रहने वाले हैं तो सर्वप्रथम पौड़ी गढ़वाल के श्रीनगर पहुंचे और यदि उत्तराखंड से बाहर अन्य राज्यों से है तो आप सर्वप्रथम राजधानी देहरादून में बस,ट्रेन,हवाई यात्रा या अपने पर्सनल कार से आ सकते हैं इसके बाद ऋषिकेश से देवप्रयाग होते हुए श्रीनगर से पौड़ी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल से लगभग 50 किलोमीटर का सफर करने के बाद आप "राहु मंदिर" में पहुंच जाएंगे। इसके अलावा यदि कुमाऊं क्षेत्र से प्रविष्टि करते हैं तो आप हल्द्वानी-रामनगर से होते हुए सीधे थलीसैंण ब्लॉक में प्रवेश कर सकते हैं और यहां से 60 से 70 किलोमीटर की दूरी तय करने के पश्चात आप पैठानी "राहु मंदिर" पहुंच सकते हैं।

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