बैकुंठ चतुर्दशी मेला श्रीनगर

वैसे तो उत्तराखंड में कई धार्मिक पर्व हैं और इन पर्वों पर जगह- जगह मेलों का आयोजन होता है। देवभूमि के नाम से जाना जाने वाला यह ,देश का एक छोटा राज्य उत्तराखंड देवों का निवास स्थान ही नहीं अपितु महापुरुषों की तपस्थली भी रहा है। इसी में एक धार्मिक पर्व है ,बैकुंठ चतुर्दशी इस पर्व पर बहुत से स्थानों पर मेलों का आयोजन होता है।

 

हम सभी जानते हैं कि मेलों का आयोजन प्राचीन समय में लोग अपने सगे- संबंधियों या मित्रों से मिलने के लिए करते थे। और साथ ही मेले का आयोजन इसलिए भी किया जाता था, ताकि इस धार्मिक पर्व पर लोग अपने देवी-देवताओं को पौराणिक महत्व के अनुसार याद कर सकें और उनकी पूजा-अर्चना भी हो सके। और इस अवसर पर सब से मिलना जुलना भी हो जाए। क्योंकि प्राचीन समय में संचार और आवागमन के साधनों के अभाव के कारण एक दूसरे की जानकारी कम ही होती थी।
इसलिए मेलों का आयोजन किया जाता था। इसमें आज हम बात कर रहे हैं "बैकुंठ चतुर्दशी" के मेले की, जो कि पौड़ी जनपद के एक शहर श्रीनगर में आयोजित किया जाता है।

श्रीनगर बैकुंठ चतुर्दशी का मेला

बैकुंठ चतुर्दशी वर्ष भर में पड़ने वाला हिंदू समाज का महत्वपूर्ण पर्व है। सामान्यतः यह "दीपावली के 14 दिन" बाद आने वाला पर्व (मेला) है। साल का यह पर्व धार्मिक महत्व का है इस अवसर पर विभिन्न शिवालयों में पूजा, अर्चना साधना का विशेष महत्व है गढ़वाल मंडल में पौड़ी जनपद के श्रीनगर शहर के प्रसिद्ध शिवालयों जैसे- कमलेश्वर मन्दिर आदि में इस पर्व पर अधिकाधिक संख्या में श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं तथा इस पर्व को आराधना व मनोकामना पूर्ति का मुख्य पर्व मानते हैं। श्रीनगर स्थित कमलेश्वर मंदिर पौराणिक मंदिरों में से है इसका अतिशय धार्मिक महत्व है कथाओं के अनुसार यह स्थान देवताओं की नगरी भी रही है इस शिवालय में भगवान विष्णु ने तपस्या करके सुदर्शन चक्र प्राप्त किया। तो, श्रीराम ने रावण वध के उपरांत ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति की कामना हेतु शिवजी को प्रसन्न किया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बैकुंठ चतुर्दशी मेले के महत्व को समझने के लिए कमलेश्वर मंदिर के महत्व और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझना आवश्यक है। त्रेता युग में रावण का वध करने के पश्चात राम जी ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति के लिए शिव की आराधना की थी। और विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र को प्राप्त करने के लिए भी शिव को प्रसन्न किया और सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। इसके साथ ही बैकुंठ चतुर्दशी पर्व पर पुत्र प्राप्ति के लिए भी भगवान शिव की आराधना करके फल प्राप्त के लिए उन्हें प्रसन्न किया जाता है।

वर्तमान परिदृश्य में मेले का महत्व

वर्तमान में यह पर्व पूजा अर्चना तक सीमित नहीं है श्रीनगर की बढ़ती आबादी और गढ़वाल के केंद्र भौगोलिक स्थिति होने के कारण यह गढ़वाल का शैक्षणिक केंद्र भी बन गया है। यहां पर विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की मौजूदगी के कारण मेला एक व्यापक रूप ले चुका है और आज के समय में सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रशासन के द्वारा इसका व्यापक धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक आयोजन किया जाता है और साथ में मंदिर की पौराणिक धार्मिक मान्यताओं और उसके साथ-साथ खेलकूद प्रतियोगिता स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को व्यापक रूप देने के लिए इसका बड़े व्यापक रूप में आयोजन किया जाता है जिससे कि आने वाली पीढ़ी को अपनी सभ्यता संस्कृति से रूबरू किया जा सके और आने वाले पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षक का केंद्र बनाया जा सके।
धन्यवाद।

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