बद्रीनाथ धाम का दृश्य

बद्रीनाथ एक ऐसा स्थान जहां पर जाते ही आप अपने सारे दुख दर्द और समस्याओं को इस कदर दरकिनार कर देंगे मानो कि आपके जीवन में इससे पहले जो भी हुआ वह सब इस दृश्य को देखने के बाद निरर्थक सा था। और जो होगा वह सब खुशमयी होगा यह स्थान प्रकृति में और हिमालय की गोद में बसा एक ऐसा स्थान है जहां की कल्पना आप स्वर्ग से कर सकते हैं। दृश्य ऐसा कि मानो प्रकृति ने आपको अपनी गोद में बिठाया हो और प्रकृति का हर एक कण आपके जीवन को खुशमयी बना रहे हो। जहां की हरियाली, पेड़, पौधे हर एक कण सब आप को आनंदित कर रहे हो। फिजाएं ऐसी कि आपके माथे को चूमते ही आपको ऐसा महसूस हो कि हर एक सांस आपको अपने नशे की आगोश में ले रही है।

पर्वत की चोटियों में सफेद बर्फ की चादर जैसे रात में एक जुगनू की तरह जगमगा रहा हो इन से बहता हुआ शीतल जल किसी अमृत के समान है और उसमें वसुधारा का दृश्य जैसे हिमालय में शिव की जटाओं से साक्षात गंगा निकल रही हो। यह सब दृश्य आप को मंत्रमुग्ध कर देते हैं इन सब सुंदरता के बीच बद्रीनाथ का मंदिर / बद्रीनाथ धाम जिसे देखकर लगता है विष्णु जी साक्षात आप को दर्शन दे रहे होंगे और आप को आभास होगा कि आप उनके चरण कमलों में विराजमान हैं. इसीलिए शायद यह देवभूमि या ऋषि-मुनियों/ महापुरुषों की तपस्थली बनी इतिहास में बहुत से ऐसे ऋषि मुनि या महापुरुषों का वर्णन है कि जिन्होंने इस स्थान को अपनी तपस्या और आराधना के लिए चुना. प्रकृति का एक ऐसा दृश्य जहां जाने के बाद आपको लगेगा कि आपका जीवन यहां आने के बाद सफल हो गया शायद इसीलिए देश विदेश से यहां हर वर्ष शस्त्रों की संख्या में सेनानी/ यात्रीगण दर्शन के लिए आते हैं।

बद्रीनाथ के बारे में/ बद्रीनाथ का इतिहास

बद्रीनाथ मंदिर भारतीय राज्य उत्तराखंड के चमोली में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर हिंदू देवता विष्णु को समर्पित है यह स्थान हिंदू धर्म मानने वालों के लिए सबसे पवित्र स्थानों में से एक है यह भारत के चार धामों में आता है। और उत्तराखंड के चार धामों में भी इसे सम्मिलित किया गया है। इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने 9 वी शताब्दी के आसपास की थी यह हिमालय के मध्य भाग पर बसा है और अधिक ठंड होने के कारण मंदिर वर्ष में अप्रैल माह के अंत से नवंबर के अंत तक खुला रहता है। इस मंदिर के नाम से यहां के आसपास के स्थान को बद्रीनाथ धाम कहते हैं यह भारत में सबसे व्यस्त तीर्थ स्थलों में से एक है

बद्रीनाथ में हिंदू धर्म के देवता विष्णु के एक रूप बद्री नारायण की पूजा होती है यहां उनकी 9 फीट (3.3 फीट लंबी) शालिग्राम से निर्मित मूर्ति है जिसे आदि गुरु शंकराचार्य ने स्थापित किया था। जिसे विष्णु के 8 अवतारों में से एक माना जाता है। यह मंदिर भारत के उत्तरी भाग में स्थित है। "रावल" कहे जाने वाले यहां के मुख्य पुजारी हैं जो दक्षिण भारत के केरल राज्य से नंबूदरी संप्रदाय के ब्राह्मण होते हैं।
विष्णु पुराण महाभारत तथा स्कंद पुराण में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। यह हिंदुओं के पवित्र चार धामों के अतिरिक्त छोटे चार धामों में भी गिना जाता है और विष्णु को समर्पित 108 दिव्या देशों में से भी एक अन्य संकल्पना अनुसार इस मंदिर को बद्री विशाल के नाम से पुकारते हैं। इसके अलावा विष्णु भगवान को समर्पित चार अन्य मंदिर है_ 1 पंच बद्री योग ध्यान बद्री 2 भविष्य बद्री 3 वृद्ध बद्री 4 आदि बद्री के समूह को जोड़कर पंच बद्री के रूप में जाना जाता है। यह सभी मंदिर उत्तराखंड राज्य में है यह मंदिर उत्तराखंड के ऋषिकेश से 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है।

नामकरण

हिमालय क्षेत्र में स्थित बद्रीनाथ धाम विभिन्न विभिन्न काल में लगभग अलग-अलग नामों से प्रचलित रहा है। स्कंद पुराण में क्षेत्र को मुक्ति प्रदा के नाम से जाना जाता है। त्रेता युग में योग सिद्ध के नाम से और द्वापर युग में मणिभद्र आश्रम या विशाल तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कलयुग में बद्रीकाश्रम या बद्रीनाथ के नाम से बद्रीनाथ नाम बद्री (बेर) के वृक्ष के कारण प डा था। एडविन टी. एटकिशन ने अपनी पुस्तक द हिमालयन गजेटियर में इस बात का उल्लेख किया है कि इस स्थान पर पहले बद्री के घने वन पाए जाते थे।

बद्रीनाथ मंदिर की स्थिति

बद्रीनाथ मंदिर की भौगोलिक स्थिति 30° 74 उत्तरी अक्षांश तथा 79°44 पूर्वी देशांतर पर है। यहां उत्तरी भारत के हिमालय में ऊंची पर्वत श्रेणियों के क्षेत्र में बसे भारतीय राज्य उत्तराखंड के चमोली जनपद में है और इस मंदिर के नाम पर ही आसपास बसे नगर को बद्रीनाथ कहा जाता है। नगर का अधिकारिक नाम बद्रीनाथ पूरी है और प्रशासनिक तौर पर यह चमोली जिले की जोशीमठ तहसील में एक नगर पंचायत है लगभग 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। भौगोलिक स्थिति से यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के छेत्र में स्थित है यह समुद्र तल से 3133 मीटर ऊंचाई पर स्थित है और हिमालय के मध्य भाग के नाम से जाना जाता है। यह क्षेत्र अलकनंदा का उद्गम स्थल भी है मंदिर अलकनंदा और उसकी सहायक ऋषिगंगा के संगम पर स्थित है।

पौराणिक कथाएं

पुराणों के अनुसार मुनि नारद एक बार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु क्षीरसागर पधारे जहां उन्होंने माता जी को उनके पैर दबाते देखा चकित नारद ने जब भगवान से इसके बारे में पूछा तो उस अपराध बोध से ग्रस्त भगवान विष्णु तपस्या करने के लिए हिमालय चल दिए भगवान विष्णु योग मुद्रा में तपस्या के लिए तपस्या में लिन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनके इस दशा को देखकर माता लक्ष्मी का ह्रदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े होकर बद्री के वृक्ष का रूप ले लिया जिससे उनको हम से बचाया जा सके कठोर तपस्या के बाद जब विष्णु उठे तो उन्होंने देखा कि लक्ष्मी में भी मेरे समान बराबर तप किया है तो आज से इस स्थान पर मुझे तुम्हारे साथ पूजा जाएगा और बद्री वृक्ष के नाम से ही जाना जाएगा।

बद्रीनाथ का मार्ग

बद्रीनाथ जाने के लिए तीन और से रास्ता है रानीखेत,कोटद्वार,हरिद्वार से होकर तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिलते हैं। उत्तराखंड देहरादून ऋषिकेश से देवप्रयाग रुद्रप्रयाग कर्णप्रयाग चमोली तथा जोशीमठ इत्यादि नगरों से होते हुए बद्रीनाथ पहुंचता है। और यहां से आगे बढ़ते हुए भारत चीन सीमा पर स्थित ग्राम माणा में पहुंचकर समाप्त हो जाता है।

केदारनाथ मार्ग से

केदारनाथ मार्ग से गौरीकुंड से गुप्तकाशी चोपता गोपेश्वर और जोशीमठ होते हुए सड़क मार्ग से लगभग 221 किलोमीटर की दूरी तय कर बद्रीनाथ मन्दिर पहुंचा जा सकता है। कभी ऋषिकेश से इस यात्रा में महीनों लग जाते थे अब सड़क मार्ग शुगम होने के कारण हफ्ते से भी कम समय लगता है जोशीमठ से बद्रीनाथ की दूरी लगभग 40 किलोमीटर है यहां से 12 किलोमीटर की दूरी पर विष्णुप्रयाग है जहां अलकनंदा और धौलीगंगा नदियों का संगम होता है विष्णुप्रयाग से लगभग 10 किलोमीटर दूर गोविंदघाट है जहां से एक रास्ता बद्रीनाथ को जाता है और दूसरा धाधरिया होते हुए फूलों की घाटी एवं हेमकुंड साहिब को जाता है। गोविंदघाट से मात्र 3 किलोमीटर के आसपास की दूरी पर पांडुकेश्वर है पांडुकेश्वर से 10 किलोमीटर हनुमान चट्टी और वहां से 10 किलोमीटर की दूरी पर बद्रीनाथ धाम स्थित है

बद्रीनाथ के दर्शन

बद्रीनाथ धाम अप्रैल माह के अंत से नवंबर माह के अंत तक खुला रहता है। इसलिए यहां दर्शन करने का उचित समय इन महिनो के बीच में है। जुलाई-अगस्त में बरसात होने के कारण पहाड़ों में मार्ग क्षतिग्रस्त रहता है जिस कारण यातायात में थोड़ी सी असुविधा हो सकती है

धन्यवाद

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2 Comments

  1. बहुत ही प्रभावशाली ढंग से बद्रीनाथ धाम का सजीव वर्णन किया है। धाम से संबंधित काफी रोचक तथ्यों की जानकारी लेख पढ़ के पता चली। आपके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी..

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