महात्मा गांधीजी के सिद्धांत व आधुनिक काल में उनकी प्रासांगिकता

कुछ सिद्धांतों के क्रियान्वयन आलोचित होते हैं। कुछ ऐतिहासिक अध्ययन का कारण बनते हैं परंतु कुछ सिद्धांत ऐसे होते हैं जो इतिहास में मील का पत्थर बन जाते हैं। और गांधीजी के सिद्धांत इसी तृतीय वर्ग मैं शामिल किए जाते हैं। राजा हो चाहे रंक सिद्धांत हर कोई प्रतिपादित करता है तथा सिद्धांतों के मतांतर में उनके व्यक्तित्व व परिस्थितियों का अंतर होता है। और गांधीजी के प्रतिपादित सिद्धांतों के द्वारा ही भारत ने जनता का रसास्वादन किया।

गांधी जी भारतीय परंपरा के महान संत, राजनीतिज्ञ, कुशल नेतृत्व करता व मानवता के पुजारी थे साथ ही साथ गांधीजी धार्मिक, आर्थिक, रूढ़िवादिता और धर्मांधता के धुर विरोधी थे। गांधी जी के सिद्धांतों में प्राथमतः सत्याग्रह व अहिंसा थी सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है सत्य हुआ सत्य के लिए आग्रह उनकी यह संकल्पना सच्ची मानी गई और उनके द्वारा सत्याग्रही अपने लिए कष्ट व असम्मान को चुनते थे। यह मात्र एक राजनीतिक हथकंडा नहीं था वरन जीवन का दर्शन एवं कर्म का सिद्धांत है। गांधीजी के अनुसार सत्यान्वेषण मानव जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। गांधी जी द्वारा सत्याग्रह का अपना पहला बड़ा प्रयोग बिहार के चंपारण में किया गया जो कि सफल रहा।
अहिंसा से गांधी जी का तात्पर्य था "मंशा वाच कर्म" ( मन से किसी का बुरा ना सोचो) 1920 से 1948 का कालखंड भारतीय इतिहास में गांधी युग के नाम से जाना जाता है। इस अवधि में भारत के अनेकों आंदोलन हुए। इन आंदोलनों में से कोई आंदोलन का नेतृत्व गांधी जी ने संभाला था। और असहयोग आंदोलन को छोड़कर किसी भी अन्य आंदोलन में हिंसा नहीं हुई। जब असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था तो उत्तर प्रदेश के चोरी- चोरा नामक स्थान पर एक हिंसक घटना के चलते गांधी जी के आह्वान पर संपूर्ण राष्ट्रीय जन आंदोलन नेपथ्य की ओर चला गया। इससे स्पष्ट होता है कि गांधीजी अहिंसा के वास्तविक पुजारी थे और वे अहिंसा को कायरता नहीं मानते थे। गांधी जी के शब्दों में "सत्य और अहिंसा ही वह अकेला धर्म है जिसका मैं दावा करना चाहता हूं"। में किसी भी परामानवीय शक्ति का दावा नहीं करता ऐसी कोई शक्ति मुझ में नहीं है।
गांधीजी के लिए धर्म कोई विशिष्ट धार्मिक तंग या वस्तु नहीं थी. धर्म एक विचार है जिसको धारण किया जाता है और यह आधारभूत सत्य है. जो सभी धर्मों से जुड़ा है उनके अनुसार भारत में धर्म राजनीतिक हलचल को आधार प्रदान करता है. गांधीजी एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संकल्पना के लिए प्रयासरत थे जिसका स्पष्ट प्रमाण खिलाफत आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। गांधीजी एक धर्म परायण हिंदू थे, मगर उनका सांस्कृतिक-धार्मिक दृष्टिकोण संकुचित ना होकर बहुत व्यापक था वह लिखते हैं "भारतीय संस्कृति न हिंदू है न इस्लामी नहीं कोई और संस्कृति यह सब का समन्वय है"! वह चाहते थे भारतीय अपनी संस्कृति में पूर्णतः लीन हो मगर दूसरी विश्व संस्कृतियों से जो कुछ अच्छे तत्व मिलते हैं उन तत्वों को हमें आत्मसात करना चाहिए।

गांधीजी के सिद्धान्त

गांधीजी के सिद्धांतों में हिंदू स्वराज महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उनके अनुसार आधुनिक पश्चिमी सभ्यता भारत की वास्तविक शत्रु है वे चाहते थे कि भारत में स्वराज की स्थापना हो और जिस की शक्ति का स्रोत आम जनमानस हो उनका मत था कि सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए चंद लोग नहीं चला सकते सत्ता के केंद्र बिंदु इस समय दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसी राजधानियां में है और मैं उसे भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बांटना चाहूंगा जिससे हर हाथ को काम वह हर पेट को रोटी मिल सके साथ ही साथ वे चाहते थे स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग किया जाए और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाय। उदाहरणार्थ विदेशी मशीनों से बने हुए कपड़े को भारत में हस्त निर्मित कपड़े से स्थानांतरित किया जाए जिससे स्पष्ट है गांधीजी कुटीर उद्योगों को भी समर्थन (संरक्षण) करना चाहते थे और पश्चिमी औद्योगिक प्रभाव का विरोध करते थे परंतु उन्होंने कभी भी भारत में उद्भ्वित होती आधुनिक औद्योगिक इकाइयों का विरोध नहीं किया।

ट्र्सटीशिप का सिद्धान्त

ट्रस्टीशिप सिद्धांत के अंतर्गत मजदूरों को पूंजीपतियों की फैक्ट्रियों में एक ट्रस्टी के रूप में कार्य करना पड़ता था तथा मजदूर इन फैक्ट्रियों के हिस्सेदार माने जाते थे इस सिद्धांत के चलते गांधीजी ने मजदूरों द्वारा की जाने वाली हड़ताल और गतिरोध को भी दूर किया। शराब बंदी के सम्बंद में गांधी जी के कार्य अविस्मरणीय कार्य किया प्रारंभ से ही वह शराब के दुष्परिणाम के बारे में लोगों को अवगत कराते थे और विशेषकर महिलाओं को शराब की दुकानों में आंदोलन करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। भारत में अनेक धर्मों के मताॅलमबी थे लेकिन इस्लाम धर्म के अंतर्गत गौ हत्या की जो व्यवस्था दी गई है उस व्यवस्था के अनुरूप मुस्लिम मतावलंबी गौ हत्या करते थे इसी को देखकर गांधीजी स्तब्ध रहते थे जिनके चलते उन्होंने गौ हत्या निषेध सिद्धांत प्रतिपादित किया।
महात्मा गांधी स्त्रियों को पुरुषों को समान अधिकार देने के प्रबल समर्थक थे। उनके अनुसार अहिंसा की नींव पर रखे गए जीवन की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरुषों को अपने भविष्य की रचना का है उतना ही अधिकार महिलाओं को भी। स्त्रियों की बौद्धिक क्षमता पुरुषों से कमरत नहीं होती है। स्त्री को अबला, बेवस, असहाय कहकर अधिकारियों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
संसार में मानव जाति प्रमुख रूप से दो वर्गों में विभक्त है पूंजीवादी एवं आम जनता लेकिन भारत में चार वर्ण में गांधीजी मनुष्य को वर्ग में बाटा नहीं देखना चाहते थे और इस से भी परे वे सिर्फ मानवतावादी थे। तथा समान न्याय, अधिकारो के पक्षधर थे (अर्थात वे वर्ग संघर्ष के भी विरोधी थे)
ग्राम स्वराज (पंचायती राज) गांधीजी का सपना था जिस को साकार करने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया उनका मत था कि गांव के प्रत्येक कार्य सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित हो अर्थात सब मिलजुल कर कार्य करें जिसमें अराजकता का कोई स्थान नहीं  होगा तथा लोग कानून व्यवस्था का आदर करेंगे। गांव में बच्चों के लिए क्रीड़ा स्थल तथा मनोरंजन की समुचित व्यवस्था पर बल दिया और गांव में थिएटर, स्कूल तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की भी पहल की। लोगों से आवाहन किया कि वे सत्ता में बढ़-चढ़कर भाग लें तथा सभी लोग सभी स्तरों पर अपने मतदान का प्रयोग करें जिससे प्रजातंत्र की सफलता सुनिश्चित हो सके क्योंकि वह मानते थे प्रजातंत्र मात्र मत देने तक सीमित नहीं है और इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में प्रजा ही सर्व सेवा होती है। साथ ही साथ गांधी जी ने शिक्षा के क्षेत्र में अनूठी पहल की बुनियादी शिक्षा पर विशेष बल दिया वास्तव में यह आवश्यक भी था । क्योंकि तत्कालीन भारत में शिक्षा की बदहाली थी और शिक्षा ही वह नीव है जिसके द्वारा भविष्य के विकास का महल खड़ा होता है। और उच्च भौतिक मूल्यों वाली शिक्षा से ही चारित्रिक विकास की अवधारणा को साकार किया जा सकता है।

सिद्धांतों की प्रसंगिक्ता

अगर आधुनिक काल में गांधी जी के सिद्धांतों की बात की जाए तो वह कुछ अंशों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। क्योंकि जिस सत्य और अहिंसा की कल्पना गांधीजी करते थे उनका आज नितांत अभाव है। क्योंकि आज हमारा सत्य कहीं खो सा गया है। संसार में अल्प ही लोग हैं जो सच्चाई के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। और झूठ फरेब के सहारे अपने सपनों की पूर्ति करने वालों की बहुल्यता दिखाई दे रही है। जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों में असत्यता का राज कायम हो रहा है। जिस नैतिकता और सदाचार की धारणा गांधीजी ने प्रतिपादित की थी वह वास्तविक पहल से दूर केवल साहित्य और सभा- सम्मेलनों तक ही सीमित कर रह गया। अहिंसा के पुजारी गांधी जी ने अहिंसा परम धर्म बताया और साथ-साथ उसका मानना था कि मंशा वाया कर्मणा (मन से किसी का बुरा नहीं सोचना) लेकिन आज हिंसा मानव के व्यव्हार में अपनी पैठ बनाई है। जहां गांधी जी मानव मन से किसी का बुरा सोचने के लिए भी उसे हिंसा की श्रेणी में रखते थे पर आज यह बात कहीं अलग अलग प्रतीत होती है क्योंकि हम न केवल अपने आकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिए पशुओं के साथ ही हिंसा नहीं बल्कि मानव का रक्त बहने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। और यही गांधी जी के सत्य- अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता प्रतीत होती।

यदपी गांधीजी एक धर्म परायण हिंदू थे लेकिन उनकी सभी धर्म के प्रति अटूट आस्था थी और वह अन्य धर्म से भी प्रभावित थे और कहते थे हमें अन्य धर्मों से अच्छे तत्वों को लेने में संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि धर्म एक विचार है जिसे हम धारण करते हैं और धर्म कोई भी हो वह बुरा कभी नहीं हो सकता है। लेकिन आज के दौर में अपने स्वार्थों के चलते हमने धर्म के मानक ही बदल दिए हैं। कहीं ना कहीं धर्म राजनीति से प्रभावित हो रहा है उदाहरण बाबरी मस्जिद, राम मंदिर। धर्म मात्र एक उपयोगी वस्तु बन गई है।

नारी सशक्तिकरण के लिए

नारी को सशक्त करने के लिए गांधी जी ने अनूठी पहल की थी तथा समान अधिकार देने की मांग भी की थी यह पहल कुछ हद तक साकार हो रही है और नारी निश्चित रूप से सशक्त वह स्वालंबी हुई है लेकिन इसी गति निहायत ही मंद रही हैं. जो महिलाएं सशक्त होकर उभरी है उसमें उनकी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और वे महिलाएं संपूर्ण भारत की नारियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती हैं. इस क्षेत्र में हमें और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है तभी गांधी जी का यह सिद्धांत जीवित रह पाएगा और इसका महत्व भी बढ़ जाएगा।

गांधीजी का ग्रामीण भारत का स्वपन

गांधी जी का ग्रामीण स्वराज (विकेंद्रीकरण) का सिद्धांत लगभग प्रासंगिकता लगता है। क्योंकि स्वतंत्रा के पश्चात सन 1957 से बलवंत राय मेहता कमीशन ने पंचायती राज व्यवस्था पर जो सुझाव दिए थे उसके आधार पर भारत वर्ष में सत्ता का विकेंद्रीकरण किया गया। साथ ही साथ गांधी जी ने वर्ग भेद का विरोध किया और सभी के लिए रोजगार का स्वपन भी देखा परंतु आज भी हमारे समाज में वर्ग भेद पसरा है और एक बड़ा तबका बेरोजगारी और भुखमरी से जूझता दिखाई दे रहा है। कुटीर और लघु उद्योग विलुप्ती के कगार पर हैं जिसके चलते ग्रामीण स्तर पर बेरोजगारी बढ़ रही है वास्तव में देखा जाए तो भारत गांवों में बसता है और जब तक ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त नहीं होती हैं। तो भारतीय अर्थव्यवस्था के सशक्त होने का कोई मतलब नहीं बनता।

यद्यपि हम 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में जी रहे हैं और समय के साथ हमने करवट भी ली है। (विकास के शिखर तक पहुंचे हैं) यद्यपि आज देश में बेरोजगारी, महंगाई, कालाधन, विषमता, ऋणग्रस्त्ता,व्याज, भ्रष्टाचार, पर्यावरण, पारिस्थितिकीय और विदेशी मुद्रा का संकट है। इसके अतिरिक्त सामाजिक असंतुलन भाषावाद, अलगाववाद, सामाजिक बुराइयां व्यापक है। गांधीजी के सिद्धांतों का अगर हम अनुकरण करें तो यह श्रेस्कर साबित होगा और गांधीजी के सिद्धांतों को भी हम जीवित रख पाएंगे। गांधी के सिद्धांतों की प्रसंगिकता मैं हरास आने का प्रमुख कारण हमारी भोक्तावादी मानसिकता व नैतिकता तथा सदाचार की भावना में आई गिरावट है। यदि हम गांधीजी के सिद्धांतों को व्यवहार में लाते हैं और कर्म से चलते हैं तो मानवता की रक्षा होगी। तभी स्वच्छ एवं संतुलित समाज बनाने की दिशा प्रशस्त होगी।

धन्यवाद
Naveensoch

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4 Comments

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। लगातार लिखिएगा।
    शुभकामनाएं।

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